25th Feb, 2026
प्रेम और परिवार की पारंपरिक धारणाओं से लेकर जाति-विरोधी चेतना, स्त्री - मुक्ति, श्रमिक संघर्ष, किसान आंदोलनों और समलैंगिकता तक हिंदी सिनेमा ने अलग-अलग समय पर अनेक विषयों को उठाया है. परंतु इन प्रस्तुतियों का स्वर अक्सर समाज के भीतर मौजूद सत्ता-संबंधों से तय होता रहा है. मुख्यधारा सिनेमा अक्सर सांस्कृतिक वर्चस्व के तहत ऐसी कहानियां गढ़ता है जो बहुसंख्यक समाज की सुविधा के अनुकूल हों.
हाशिए की पीड़ को या तो रूमानी बना दिया जाता है या उसे उपहास और तिरस्कार से ढक दिया जाता है. लेकिन कुछ फिल्मकार इस वर्चस्व को तोड़ते हैं और वैकल्पिक दृष्टि प्रस्तुत करते हैं.
इसी परिप्रेक्ष्य में निर्देशक नीरज घेवान की फिल्म ‘होमबाउंड’ आती है. यह फिल्म एक यथार्थवादी सिनेमा का सशक्त उदाहरण है, जो समाज की कठोर सच्चाइयों को नाटकीय चकाचैंध में लपेटने के बजाय उन्हें सीधे दर्शक के सामने रखती है. यह फिल्म समाज में मौजूद जाति और धर्म पर आधारित भेदभाव, बेरोजगारी की त्रासदी, सबाल्टर्न समुदायों के संघर्ष और महामारी के दौरान विस्थापन की पीड़ा को इस तरह प्रस्तुत करती है कि दर्शक उससे खुद को अलग नहीं कर पाता. फिल्म की कथा- संरचना बहुत पेचीदा नहीं है बल्कि इसकी ताकत इसकी सादगी में है. यह दो दोस्तों शोएब और चंदनकी कहानी है. दोनों भारतीय समाज के उन्हीं छोटे कस्बों से आते हैं जहां आज भी शिक्षा और सरकारी नौकरी को सामाजिक सम्मान की अंतिम सीढ़ी माना जाता है. उनके परिवार आर्थिक रूप से कमजोर हैं और सामाजिक रूप से हाशिए पर हैं. दोनों नौजवान अपनी पहचान के बोझ से जूझते हुए बेहतर जीवन की तलाश में हैं. उनकी दोस्ती एक ऐसी डोर है जो बार-बार खिंचती और टूटती है. जीवन की कठिन परिस्थितियों और व्यक्तिगत असफलताओं के बीच यह दोस्ती उन्हें सहारा भी देती है. कहानी का शुरुआती हिस्सा भारतीय समाज की उस बड़ी सच्चाई को दिखाता है जिसमें लाखों युवा सरकारी नौकरियों के लिए वर्षों तक तैयारी करते हैं, परीक्षाओं में बैठते हैं, पर नौकरियां या तो कम संख्या में आती हैं या वर्षों तक अटकी रहती हैं. यह यथार्थ केवल आंकड़ों में नहीं बल्कि युवाओं के जीवन में गहराई से मौजूद है.
रेलवे स्टेशन पर पुलिस भर्ती परीक्षा के लिए उमड़ी भीड़ का दृश्य इस पीड़ा को तीखे तरीके से सामने लाता है. चंदन और शोएब की तरह हजारों लड़के परीक्षा देने आए हैं. यह दृश्य केवल परीक्षा की भीड़ नहीं दिखाता, यह उस टूटे हुए सपने को दिखाता है जिसे बेरोजगारी ने घेर लिया है. उदाहरण के तौर पर, उत्तर प्रदेश में जूनियर हाईस्कूल शिक्षक भर्ती परीक्षा को चार साल बीत चुके हैं लेकिन परिणाम नहीं आए. इसी तरह तमाम भर्तियां लटकी हुई हैं. यह केवल एक राज्य की नहीं, पूरे देश की सच्चाई है. इस बेरोजगारी के बीच दोनों दोस्तों के परिवार बेहद नाजुक आर्थिक स्थिति में हैं. शोएब एक किसान परिवार से हैं. उसके पिता घुटनों की बीमारी से जूझ रहे हैं. वह अपनी छोटी नौकरी से ईएमआई पर लोन लेकर पिता की सर्जरी करवाता है. चंदन का परिवार दिहाड़ी मजदूर है. उसकी मां और बहन भी मजदूरी करती हैं. यही मां जिसे कभी चप्पल भी नसीब नहीं हुई, उसी के लिए चंदन अपनी पहली कमाई से सैंडल खरीदता है, पर तब तक बहुत देर हो चुकी होती है.
फिल्म बेरोजगारी के साथ-साथ दोस्ती में होने वाली जटिल भावनाओं को भी सूक्ष्मता से पकड़ती है. जब पुलिस भर्ती का परिणाम आता है और चंदन सफल हो जाता है, तो शोएब अवसाद में चला जाता है. उसकी ईर्ष्या , असफलता और आत्महीनता दोस्ती में दरार डाल देती है. वह चंदन से कहता है‘‘साले तू तो फाॅर्म भी नहीं भर रहा था. मैंने भरा तेरा फाॅर्म. अब मुझे तेरी खैरात नहीं चाहिए.’’ यह दृश्य केवल व्यक्तिगत भावनाओं की कहानी नहीं है, यह उस व्यापक सामाजिक मनोविज्ञान को दर्शाता है जिसमें सीमित अवसरों के कारण युवा एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी बन जाते हैं.
कहानी में पहचान एक केंद्रीय तत्व है. शोएब और चंदन दोनों अपनी-अपनी पहचान के बोझ से जूझते हैं शोएब मुस्लिम है और चंदन दलित. फिल्म दिखाती है कि कैसे धार्मिक और जातिगत पहचान को लेकर समाज में लगातार पूर्वाग्रह और अपमान मौजूद हैं. शोएब की स्थिति पर ध्यान दें. गली-क्रिकेट में उसे कहा जाता है‘‘अपने लोगों के साथ खेल.’’ यह एक मामूली-सा वाक्य लगता है, पर यह उस अन्यीकरण को दिखाता है जिसमें बहुसंख्यक समुदाय अल्पसंख्यक को हमेशा बाहर धकेलता है. बाद में जब शोएब एक आरओ वाॅटर कंपनी में चपरासी का काम करता है, तो एक उच्च जाति का हिंदू कर्मचारी उससे चाय नहीं मंगवाता क्योंकि वह मुस्लिम है. वह उससे आधार कार्ड लाने को कहता है जबकि अन्य कर्मचारियों से ऐसा नहीं करता. यही कर्मचारी भारत- पाकिस्तान मैच के समय कहता है‘‘अरे यह क्यों खुश होगा? इसके वाले तो हार गए.’’ यह संवाद भारत में मुसलमानों
के प्रति गहरे बैठे अविश्वास और रूढ़ धारणाओं को नंगा कर देता है.
यहां मिशेल फूको की अवधारणा ‘ज्ञान और शक्ति’ लागू होती है. उन्होंने दिखाया कि शक्ति केवल राजनीतिक संस्थाओं या पुलिस-फौज से नहीं आती, वह ज्ञान-व्यवस्था से भी बनती है. जब कोई समाज किसी समूह को ‘खतरनाक’, ‘अविश्वसनीय’ या ‘बाहरी’ मानने वाला ज्ञान रच देता है तो यह ज्ञान ही शक्ति बन जाता है. शोएब के साथ होने वाला अपमान यही बताता है कि समाज ने एक सत्य गढ़ दिया है कि मुसलमान भरोसे के लायक नहीं. चंदन की कहानी उतनी ही गहरी है. वह अपनी जाति की वजह से लगातार आत्मग्लानि में जीता है. भर्ती बोर्ड के कर्मचारी से उसका सामना उस जाति- वादी मानसिकता को खोलता है जो आज भी सरकारी दफ्तरों में जड़ जमाए बैठी है. जब कर्मचारी उससे नाम, जाति, गोत्रा पूछता है और संतुष्ट होने पर ही उसका काम करता है तो यह दृश्य संवैधानिक लोकतंत्रा और सामाजिक लोकतंत्रा के बीच की गहरी खाई को उजागर करता है. चंदन खुद को ‘कायस्थ’ बताता है ताकि उसे सम्मान मिल सके. यह केवल एक युवक की निजी रणनीति नहीं है, यह उस ऐतिहासिक अपमान का परिणाम है जिसने दलित समुदाय को बार-बार उनकी औकात दिखाने की कोशिश की है.
चंदन के भीतर बैठी यह हीनता और अपनी जाति छुपाने की प्रवृत्ति उसी सांस्कृतिक वर्चस्व का परिणाम है. फिल्म में एक और महत्वपूर्ण बिंदु भाषा है. जब शोएब को सेल्समैन की नौकरी मिलती है तो उसके सहकर्मी त्रिपाठी कहते हैं, ‘‘इसे तो अंग्रेजी भी नहीं आती.’’ लेकिन उसका बाॅस कहता है, ‘‘भाषा से बड़ी होती है काबिलियत.’’ यह संवाद गांव से आए छात्रों और युवाओं के लिए एक आश्वस्ति है कि अंग्रेजी न जानना अक्षमता नहीं है. यहां फिल्म हिंदीभाषी युवाओं के आत्म- विश्वास को छूती है.
लाॅकडाउन के दृश्य भारतीय सिनेमा में शायद ही इतनी सच्चाई के साथ पहले दिखाए गए हों. सूरत की कपड़ा मिल में काम करने के बाद जब दोनों घर लौटने को मजबूर होते हैं तो वे उसी दुःस्वप्न को जीते हैं जो 2020 में लाखों प्रवासी मजदूरों ने जिया. ट्रकों पर ठूंसे गए लोग, प्यास से बेहाल, भूख से कमजोर और पुलिस की लाठियों के साये में भयभीत -ये दृश्य समाचारों में देखे गए थे, पर ‘होमबाउंड’ उन्हें व्यक्तिगत जीवन के दुख में बदल देती है. जब चंदन बीमार पड़ता है और गांव में लोग उन पर पत्थर फेंकते हैं, पर एक बूढ़ी अम्मा पानी पिलाने आती हैं यह दृश्य भारत की सामाजिक विडंबना का सार है. यहां करुणा और क्रूरता साथ-साथ हैं.
इस पूरे हिस्से में निर्देशक यथार्थवादी सिनेमा की परंपरा को आगे बढ़ाते हैं और कहानी को नाटकीय बनाने के लिए कृत्रिमता नहीं लाते. कैमरा मानो चुपचाप जीवन को रिकाॅर्ड कर रहा हो. संगीत बहुत कम है, दृश्य ही भावनाएं पैदा करते हैं. कलाकारों का अभिनय इतना सहज है कि दर्शक खुद को उसी दुनिया में पाता है. ईशान खट्टर ने शोएब के दर्द और प्रतिरोध को जीवंत किया है. विशाल जेटवा ने चंदन की भूमिका में हृदयविदारक यथार्थ रचा है. जाद्दवी कपूर सुधा के छोटे परंतु महत्वपूर्ण किरदार में अपनी पहले से बनी छवि को तोड़ती हैं. शोएब और चंदन की कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, वैसे-वैसे उनके भीतर छिपी सबसे बड़ी आकांक्षा उभरती है शक्ति पाने की आकांक्षा. यह शक्ति उनके लिए केवल नौकरी या तनख्वाह नहीं है बल्कि वह सामाजिक सम्मान और सुरक्षा है, जिससे वे अब तक वंचित रहे हैं. उनके लिए पुलिस की वर्दी सिर्फ काम नहीं बल्कि पहचान बदलने का एक अवसर है. रेलवे स्टेशन पर पुलिस को भीड़ पर लाठियां चलाते देख जब दोनों दोस्त कहते हैं कि एक दिन हमारा भी भौकाल होगा तो यह दृश्य उस गहरी इच्छा को उजागर करता है जिसे सदियों की वंचना ने जन्म दिया है. जिन समुदायों को इतिहास ने लगातार हाशिए पर रखा है, उनके लिए शक्ति एक दूर का सपना नहीं बल्कि अस्तित्व का सवाल है. जब चंदन अपनी मां के अपमान को देखकर कहता है कि अगर हम आज पुलिस में होते तो हमारी मां को कोई हटा नहीं पाता, तब यह बात सिर्फ नौकरी पाने की नहीं रह जाती, यह अपनी मां की आंखों में सम्मान लौटाने की एक गहरी आकांक्षा बन जाती है.
फिल्म यह भी दिखाती है कि शक्ति केवल वर्दी में नहीं होती. सुधा, जो अपेक्षाकृत सशक्त दलित पृष्ठभूमि से आती है, इसका प्रतीक है. सुधा के परिवार के पास स्थिर नौकरी और सरकारी आवास है इसलिए उसकी आकांक्षा शक्ति पाने से आगे बढ़कर ज्ञान की ओर है. वह काॅलेज को बड़ा सपना मानती है. वह चंदन से कहती है कि अगर वह काॅलेज पढ़ लेगा तो कुछ बड़ा बन सकता है लेकिन चंदन की आर्थिक स्थिति उसे बताती है कि पुलिस की नौकरी ही सबसे बड़ी उपलब्धि है. यह अंतर केवल दो व्यक्तियों का नहीं है बल्कि यह बताता है कि हाशिए के समुदाय भी एकसमान नहीं हैं. जो अपेक्षाकृत स्थिरता पा चुके हैं, वे उच्च शिक्षा और ज्ञान की ओर बढ़ सकते हैं, लेकिन जो अब भी दरिद्रता और अपमान के बीच जी रहे हैं, उनके लिए सबसे पहले स्थिर आय और सामाजिक सुरक्षा ही शक्ति का पर्याय है.
ग्राम्शी ने कहा था कि हर वर्चस्व के भीतर प्रतिरोध की संभावना भी छिपी होती है. ‘होमबाउंड’ इन्हीं प्रतिरोधों को सूक्ष्म संकेतों में दिखाती है. शादी में आंबेडकर और बुद्ध के चित्रों का होना केवल सजावट नहीं है बल्कि यह दलित समुदाय द्वारा अपनी प्रति संस्कृति गढ़ने का प्रयास है. सुधा का चंदन को किताबें देना, उसे पढ़ाई में मदद करना और ‘पे बैक टू सोसायटी’ की सोच को जीना भी उस सामूहिकता का हिस्सा है जो वर्चस्व को चुनौती देती है. फिल्म यह स्पष्ट करती है कि भले ही वर्चस्व गहरा हो लेकिन शिक्षा, साझा अनुभव और स्मृति उसके खिलाफ धीरे-धीरे नई दीवारें खड़ी करती हैं.
फिल्म का सबसे मार्मिक और राजनीतिक क्षण वह है जब चंदन की मां रसोइया की नौकरी से निकाले जाने के बाद घर आकर आंबेडकर की तस्वीर को देखती हैं. उनके चेहरे पर आंसू हैं, मानो वह संविधान से ही सवाल कर रही हों कि क्या यह देश उन्हें कभी बराबरी देगा. आंबेडकर की तस्वीर का बार-बार दिखना बताता है कि दलित समाज ने अपनी मुक्ति के प्रतीकों को गढ़ लिया है और उनसे ऊर्जा लेता है.
फिल्म का अंतिम दृश्य, जिसमें चंदन की लाश के साथ पुलिस का जाॅइनिंग लेटर उसके गांव पहुंचता है, लोकतंत्रा की वर्तमान विडंबना का सबसे तीखा प्रतीक है.
फिल्म एक जरूरी सवाल उठाती है कि क्या हाशिए के सभी समुदाय समान रूप से लाभान्वित हुए हैं! हाल के वर्षों में सर्वाेच्च न्यायालय ने अनुसूचित जातियों और जनजातियों के उपवर्गीकरण पर विचार किया है. इसका अर्थ यह है कि आरक्षण का लाभ अक्सर उन्हीं जातियों तक सीमित रह गया है जो पहले से कुछ संसाधन प्राप्त कर चुकी हैं. फिल्म यह मानने से इनकार करती है कि पितृसत्ता केवल ऊंची जातियों में मौजूद है. चंदन की बहन का संवादकृ‘तेरी पढ़ाई के लिए मेरी पढ़ाई छुड़वा दी’ इस सच्चाई को सामने लाता है कि हाशिए पर खड़े समुदायों में भी पुरुष केंद्रिकता कायम है. लड़के को ‘घर का चिराग’ मानकर लड़की की शिक्षा बलिदान कर दी जाती है. यह सवाल महत्वपूर्ण है क्योंकि दलित विमर्श में अक्सर वर्ग और जाति पर ध्यान दिया जाता है, पर लैंगिक असमानता को नजरअंदाज कर दिया जाता है.
अंततः ‘होमबाउंड’ सिर्फ एक फिल्म नहीं रहती, यह एक दस्तावेज बन जाती है. यह आज के भारत के उस हिस्से को आवाज देती है जिसे अक्सर मौन रखा जाता है रोजगार युवा, दलित, मुसलमान, ग्रामीण महिलाएं और प्रवासी मजदूर. यह हमें दिखाती है कि संवैधानिक आदर्शों और वास्तविक जीवन में कितना अंतर है. सिनेमा को केवल मनोरंजन मानने वाले दृष्टिकोण को यह फिल्म चुनौती देती है. इस दृष्टि से ‘होमबाउंड’ आने वाले समय में हिंदी सिनेमा और सामाजिक अध्ययन दोनों के लिए एक सशक्त संदर्भ बनेगी. फिल्म हमें याद दिलाती है कि कला केवल सौंदर्य के लिए नहीं बल्कि न्याय और समानता की तलाश में भी होती है.
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